गोस्वामी तुलसीदास की गरीबी और दरिद्रता का वर्णन उनकी अनेक लम्बी कविताओं में हुआ है. उनकी गीतावली, विनयपत्रिका, दोहावली और कवितावली में अनेक जगह दरिद्रता पर उनका रुदन देखा जा सकता है. उन्होंने दरिद्रता को सबसे बड़ा दुःख कहा “नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं”. तुलसीदास सन्यासी हो चुके थे जब वह लेखन कर रहे थे लेकिन सम्भवत: सन्यासी जैसे नहीं रह रहे थे. सन्यासी तो समदर्शी होता है, वह धनहीनता को दुःख नहीं मानता. सन्यासी कभी दरिद्रता और धनहीनता पर रुदन नहीं करता. तुलसीदास एक कवि थे और कवि की तरह ही जीवन यापन कर रहे थे. अपने पूर्वजन्म के बुरे कर्मों के कारण जन्मना ही माता पिता द्वारा त्याग दिए गये थे क्योंकि इनका जन्म अशुभ अभुक्त मूल नक्षत्र हुआ था. तुलसीदास ने इस तथ्य को खुद ही लिखा है “मातु पिता जग जाइ तज्यो, विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई।” तथा “तनु जन्यों कुटिल कीट ज्यों तज्यो माता पिता हूँ।” गरीबी और दरिद्रता ऐसी थी कि उन्होंने मस्जिद में सोने की बात को भी स्वीकार किया है .
‘तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचे सो कहै कछु कोहू
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैवे को एक न दैबे को दोऊ।’
तुलसीदास ने अपनी कविताओं में एक तो यह बताया है कि उन्हें सप्तमी तिथि में गंडमूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण माता पिता ने त्याग दिया था तथा दूसरी बात यह कही है कि मीन का शनि होने से दरिद्रता चरम पर रही –

“कोढ़ में की खाजु सी सनीचरी है मीन की “ ऐसा शनिदशा का चित्रण है मतलब एक तो कोढ़ ऊपर उसे खाज-खुजली ? अर्थात तुलसीदास बद से बदतर शनि दशा से गुजरे थे जब उन्होंने कवितावली लिखा था. इस आधार पर तुलसी दास की कुंडली बनाई जा सकती है. इस महादशा के बाद उनकी बुध की महादशा चली होगी जिसमें उन्होंने रामचरित मानस की रचना की थी. बाहों में असीम पीड़ा और कष्ट में उन्होंने हनुमान बाहुक में हनुमान से बिनती की “महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये॥” सैकड़ों कविताओ की पद्य, दोहे, पंक्तियाँ दुःख और पीड़ा निवृत्ति के लिए लिखी गई हैं. एकतरह से तुलसी दास जगह जगह मानो दुःख और दरिद्रता में रुदन और चीत्कार कर उठे हैं. उन्होंने 76 वर्ष की आयु में श्रीरामचरित मानस की रचना शुरू की थी और इस ग्रंथ को पूरा होने में 2 साल 7 माह और 26 दिन का समय लगा था. यह उनके वृद्धावस्था की कृति है. इससे पूर्वं उन्होंने अनेक प्रकार से भाषा पर पकड़ बनाने के लिए कांड के अनुसार लम्बी कविताओं को लिखा था. उनकी जितनी भी लम्बी कविताएँ हैं वो छोटी-मोटी रामायण हैं.

