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मां दुर्गा (Durga Puja) की आराधना का पर्व करीब है. जिन्हें नवरात्रि करनी है उन्हें अभी से मन बना लेना चाहिए. नवरात्रि करने से सभी परेशानियां दूर होती हैं और घर में सुख शांति आती है. इस बार शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व 15 अक्टूबर से शुरू हो रहा है और इसका समापन 23 अक्टूबर को होगा. नवरात्र‍ि में श्री यंत्र स्थापित कर उसका विधिपूर्वक पूजन करने से मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है. श्रीयंत्र को यंत्रराज कहा गया है, जितने भी यंत्र हैं उन सभी का प्रादुर्भाव श्रीयंत्र से माना गया है. शास्त्रों में श्रीयंत्र की पूजा का विशेष प्रावधान है. यह कोई मूर्ति नहीं कि अमेजन पर ऑर्डर कर दो और पूजा शुरू कर दो. श्रीयंत्र सब शक्तियों और सिद्धियों का द्वार है, इसकी दीक्षा लेकर विधिपूर्वक पूजा-आराधना करने से ही इसका फल प्राप्त होता है अन्यथा हानि ही होती है. श्रीयंत्र के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है –
बिंदु त्रिकोण वसु कोण दशारयुग्मं , मन्वस्स्र नागदल संयुत षोडशारम ।
वृत्तत्रयं च धरणीम् सदनत्रयं च , श्री चक्रमेवमुदितं पर देवताया: ।।

श्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है.  इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं. इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं. ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं. श्रीयंत्र दो प्रकार से बनता है -1 संहार क्रम 2-सृष्टि क्रम. सांसारिक लोगों के लिए सृष्टि क्रम से यंत्र का निर्माण करवाना चाहिए. सृष्टि क्रम में चक्र का क्रम से वाह्य प्रसार होता है जबकि सम्हार क्रम में लय होता है. इन दोनों प्रकार के यंत्रों का पूजन क्रम भी उसी प्रकार से होता है.

आदि शंकराचार्य ने तीन या चार जगह श्रीयंत्र स्थापित किये थे – मीनाक्षी मन्दिर मदुरै, मूकाम्बिका मन्दिर, और कामाक्षी अम्बा मन्दिर, कांची. एक श्रीयंत्र कहीं और भी स्थापित किया था जो अज्ञात है. इसके इतर चार श्रीयंत्र, चार नीलम के शिवलिंग के साथ उन्होंने अपने चार शिष्यों को भी प्रदान किया था जो आज भी चारो आश्रमों के शंकराचार्य के पास है और वे उसी की पूजा करते हैं. तिरुपति बाला जी श्रीयंत्र पर ही अवस्थित हैं जिस कारण मन्दिर दुनिया का सबसे धनी मन्दिर है. अम्बा जी माता मंदिर में पवित्र श्रीयंत्र की पूजा ही की जाती है. इस यंत्र को कोई भी सीधे आंखों से देख नहीं सकता, इसकी फोटोग्राफी निषेध है. यह मंदिर लगभग 1200 वर्ष से अधिक प्राचीन माना जाता है. यही श्रीयंत्र की महिमा है.

श्रीयंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है. यह संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा विकास का प्रतीक होने के साथ मानव शरीर का भी द्योतक है. श्रीयंत्र को ऐसे ही कहीं से खरीद’कर पूजा करने से सदैव हानि होती है, यह सभी शास्त्रों में लिखा गया है. शास्त्रों में कहा गया है कि घर में प्राण प्रतिष्ठायुक्त श्रीयंत्र को कामना के अनुसार स्थापित करना या करवाना चाहिए. श्रीयंत्र चांदी या सुवर्ण का होना चाहिए अथवा स्फटिक का सुंदर श्रीयंत्र होना चाहिए. अन्य धातुओं पर बने श्रीयंत्र हेय माने गये हैं क्योंकि यह श्रीयंत्र त्रिपुरसुन्दरी महालक्ष्मी का यंत्र है. फैक्ट्री में बने अशुद्ध यंत्र तो कभी भूलकर भी घर में न रखें. श्री यंत्र को किसी आचार्य की देखरेख में किसी शुभ तिथि और मुहूर्त में बनवाना चाहिए.  यदि सोने चांदी पर नहीं बनवा सकते तो रेशम के कपड़े पर शुभ तिथि और मुहूर्त में बनवाएं, लेकिन यह श्रीयंत्र एकवर्ष बाद बदलना पड़ता है. श्री यंत्र को चांदी या सोने के पत्र पर उभरा हुआ होना चाहिए, उसकी रेखाएं भी उभरी हुई होनी चाहिए. श्रीयंत्र की पूजा बिना दीक्षा के नहीं होती, यह आगम कल्पद्रुम, मन्त्र मुक्तावली, आगम सार इत्यादि ग्रन्थों और श्रीविद्या परम्परा के सभी ग्रंथों में कहा गया है.
अदिक्षिता ये कुर्वन्ति जपपूजादिका: क्रिया:।
न भवन्तु फलं तेषां शिलायामुप्तबीजवत।।

अदीक्षित द्वारा किये जप इत्यादि भी सफल नहीं होते क्योंकि उन्हें मन्त्र देवता और उसके द्रष्टा ऋषियों का आशीर्वाद नहीं मिलता. सब जपादि कर्म व्यर्थ होगा और मन्त्र का क्रोध अलग होता है यह जापक का नाश कर देता है.

आप बाजारू ज्योतिषी और पुजारियों के चक्कर में खुद का नाश न करें, ये टीवी-यूट्यूब पर बैठ कर फैक्ट्री निर्मित यंत्र बेचते हैं. श्रीयंत्र कोई कमोडिटी नहीं है और न ही कोई ब्यूटी क्रीम है. यह देवता का ज्योतिर्मय विग्रह है.