जगजननी भगवती के सहस्रों नाम के द्वारा उनके स्वभाव का निर्देश किया गया है. शास्त्रों में उनके ज्यादातर नाम वास्तव में नाम न होकर उनके स्वरूप की व्याख्या हैं. ललिता सहस्रनाम में भगवती के हजारों नाम में एक नाम “हरिगोपारुणांशुका” भी है. हरिगोप एक रंगीन रक्त वर्ण का कीड़ा हैं जो बहुत सुंदर दिखता. अब भगवती कीड़ा तो नहीं हो सकतीं ? लेकिन वही सबकुछ बनी है. वही हरिगोप भी हैं, शेर भी हैं, मनुष्य और देवता भी हैं लेकिन इससे परे भी हैं. उनसे परे कुछ भी नहीं, सब उनमे ही अवस्थित है “मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय” जैसा गीता में भी कहा गया है. वही सबकी बुद्धि, ज्ञान, चेतना, अबुद्धि, अज्ञानता, श्रद्धा इत्यादि के रूप में स्थित हैं.
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।
एक आचार्य ने देवी के इस नाम “हरिगोपारुणांशुका” की व्याख्या में लिखा ” आर्द्रा मघा वर्षासमुद्भवा अष्टपाद रक्तवर्ण मृदवङ्ग: कीट विशेष:” जब आर्द्रा नक्षत्र से मघा तक सूर्य ट्रांजिट कर रहा होता है तब यह कीट जिसका नाम हरिगोप है प्रकट होता है.अष्टभुजा की तरह यह भी रक्तवर्ण का है, आठ भुजाएं हैं.

कहने का अर्थ है कि देवी की रश्मियों का रंग रक्त है और विमर्श भी रक्त वर्ण है. जब सूर्य आर्द्रा में जाता है तब सृष्टि रजोगुणी हो जाती है, पृथ्वी रजस्वला होती है और कामाख्या देवी भी रजस्वला हो जाती हैं. वहां 3 दिन उत्सव मनाते हैं. आचार्य द्वारा प्रकृति का यह सूक्ष्म observation गौरतलब है. प्रकृति किस तरह विकार को प्राप्त करती है उसका यह एक बेहतरीन उदाहरण है. इस सृष्टि का प्राकट्य कोई नई उत्पत्ति नहीं है इसलिए उत्पत्ति न कह कर महर्षि कपिल ने इसे विकार कहा. वेदांत भी किसी भी प्रकार की उत्पत्ति का निषेध करता है.
इस उदाहरण द्वारा हम यह भी देख सकते हैं कि किस तरह सृष्टि में एकतानता है, किस तरह इनका अंतर्संबंध है और किस तरह ग्रह नक्षत्रों का सृष्टि पर गहरा प्रभाव है. यह हरिगोप कीड़ा और कभी किसी भी समय पैदा नही हो सकता. यह उसी नक्षत्र में पैदा होता है जब सूर्य वहां गोचर करता है, इसका गहरा सम्बन्ध राशि विशेष से है. यह इसका सूक्ष्म ज्योतिष प्रसंग है.

